सहकारी समिति क्या है कैसे बनायें? How to Register a Cooperative Society.

सहकारी समिति यानिकी Cooperative Society की यदि हम बात करें तो यह भारत या विश्व में कोई नई अवधारणा नहीं है । बल्कि सच्चाई यह है की यह दशकों पहले से चली आ रही है और वर्तमान में वैश्विक स्तर पर व्याप्त होने के कारण यह एक सार्वभौमिक अवधारणा बन गई है। कहने का आशय यह है की सहकारी समिति दुनिया के सभी देशों में अपना काम कर रही हैं और इन्हें कृषि, खाद्य, वित्त इत्यादि सभी क्षेत्रों में कार्य करते हुए देखा जा सकता है। आम तौर पर सहकारी समिति का गठन कमजोर वर्ग के लोगों के हितों की रक्षा के लिए किया जाता है। यह व्यक्तियों का एक स्वैच्छिक संगठन होता है जिसका मकसद सदस्यों की भलाई एवं कल्याण का होता है। Cooperative Society अनेकों प्रकार की हो सकती है लेकिन इनका लक्ष्य कमजोर वर्ग के लोगों के हितों की रक्षा एवं सदस्यों के कल्याण का ही होता है। इसके लिए समिति से जुड़े सदस्य स्वयं पैसे एकत्रित करके इन्हें किसी जरूरतमंद को ब्याज पर उधार दे सकते हैं। और यदि सहकारी समिति के किसी सदस्य को पैसों की आवश्यकता होती है तो उससे आम तौर पर अन्य की तुलना में कम ब्याज या फिर ब्याज मुक्त ऋण दिया जाता है। यह सब समिति के सदस्य ही तय करते हैं की वे अपने कल्याण के लिए क्या क्या कदम उठा सकते हैं।

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सहकारी समिति क्या है (What is Cooperative Society in Hindi)  

एक सहकारी समिति को एक स्वायत्त संगठन भी कहा जा सकता है, जिसे अपनी स्वेच्छा से एकत्रित हुए लोगों द्वारा अपनी आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जरूरतों और आकांक्षाओं को पूरा करने के उद्देश्य से संचालित किया जाता है। कहने का आशय यह है की एक Cooperative Society अपनी मनमर्जी या स्वेच्छा से एकत्रित हुए लोगों द्वारा बनाया गया एक स्वायत्त संगठन होता है। जिसका लक्ष्य समिति के सदस्यों की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करके उनका कल्याण करना होता है। 

सहकारी समिति की विशेषताएं (Features of Cooperative Society)

सहकारी समिति की कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं।

  • जैसा की हम सब अच्छी तरह से जानते हैं की सहकारी समिति एक स्वैच्छिक संगठन होता है इसलिए इसकी सदस्यता भी स्वैच्छिक ही होती है। कोई भी व्यक्ति इसमें शामिल होने के लिए स्वतंत्र है और वह इसे कभी भी छोड़ भी सकता है। धर्म, लिंग एवं जाति से परे इसकी सदस्यता सभी के लिए खुली रहती है।
  • चूँकि सहकारी समिति को समाज द्वारा एक अलग क़ानूनी पहचान के तौर पर जाना जाता है इसलिए इसका रजिस्ट्रेशन करवाना अनिवार्य है।
  • इसका पंजीकरण होने के बाद यह और सदस्यों के प्रवेश या निकासी से प्रभावित नहीं होता है।
  • Cooperative Society  में सदस्यों की देयता सिमित होती है यह सदस्यों द्वारा योगदान के माध्यम से जमा की गई पूँजी तक ही सिमित होती है।
  • सहकारी समिति में सदस्यों की वोटिंग के माध्यम से एक प्रबंधन समिति निर्वाचित की जाती है इस समिति के पास निर्णय लेने की शक्तियाँ निहित होती हैं। कहने का आशय यह है की प्रबंध समिति का गठन सदस्यों द्वारा दिए गए वोटों के आधार पर होता है ।
  • सहकारी समितियाँ पारस्परिक सहयोग और कल्याण के सिद्धांत पर ही काम करती हैं। पारस्परिक सहयोग के चलते ही यह समिति ऐसी योजना बनाने में कामयाब हो पाती है जिसके चलते यह सदस्यों की जिन्दगी आसान बनाने में अहम् भूमिका निभा सके।

सहकारी समिति के प्रकार (Types of Cooperative Society):

सहकारी समिति के कुछ प्रमुख प्रकारों की लिस्ट निम्नलिखित है।

1. सहकारी उत्पादक (Producer Cooperative)

इस प्रकार की सहकारी समिति का निर्माण छोटे उत्पादकों के हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से की जाती है। इस प्रकार की सहकारी समिति के सदस्यों में किसान, जमीन के मालिक, मछली पालन के संचालक इत्यादि हो सकते हैं। उत्पादन क्षमता एवं मार्केटिंग की संभावनाओं को बढाने के लिए इस प्रकार की Cooperative Society के सदस्य या निर्माता एक साथ या अलग अलग संस्थाओं के तौर पर कार्य करने का निर्णय लेते हैं। वे अपने उत्पादों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रसंस्करण, मार्केटिंग एवं डिस्ट्रीब्यूशन जैसी कई गतिविधियों को अंजाम देते हैं। यह लागत को कम करने में तो मदद करता ही है साथ में कई क्षेत्रों में व्यापत उपभेदों को भी पारस्परिक सहयोग से दूर करता है।

2. सहकारी उपभोक्ता (Consumer Cooperative Society)

इस तरह की सहकारी समिति का गठन एक विशेष क्षेत्र के उपभोक्ताओं द्वारा उनके पारस्परिक लाभ के लिए किया जाता है। इन Cooperative Society का उद्देश्य बिचौलियों द्वारा पैदा की गई समस्याओं से निजात पाना है। बिचौलियों के कारण न केवल उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं की कीमत बढती है बल्कि बाजार में सामानों की कृत्रिम कमी भी पैदा हो सकती है। इसलिए इस प्रकार की समितियों का लक्ष्य उपभोक्ताओं को अनुकूल कीमत में सामान उपलब्ध कराना होता है। इसलिए इस तरह की समितियों में उपभोक्ता गठबंधन करते हैं और खुद ही कुछ व्यापारों का प्रबंधन भी करते हैं जो उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हो सके।

3. क्रेडिट सोसाइटीज (Credit Societies)

भारत में इस प्रकार की सहकारी समिति का गठन पहली बार कोआपरेटिव क्रेडिट सोसाइटीज एक्ट 1912 के तहत किया गया था। इस प्रकार की सहकारी समिति अपने सदस्यों को अल्पकालीन वित्तीय सहायता एवं उनकी बचत करने की आदत को बढ़ावा देने का काम करती हैं। इस प्रकार की ये Cooperative Society  सदस्यों को शेयर बेचकर अपनी पूँजी एकत्रित करते हैं। और यदि किस जरूरतमंद को पैसों की आवश्यकता होती है तो ये समितियाँ ब्याज पर उसे पैसे भी प्रदान करती हैं। सदस्यों को अनेकों उद्देश्यों के लिए कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराये जाते हैं।

4. मार्केटिंग सहकारी समिति (Marketing Cooperative Society)

इस प्रकार की इस समिति का गठन छोटे उत्पादकों द्वारा अपने सामान को बेचने एवं अपनी मदद करने के उद्देश्य से किया जाता है। इसलिए इस सहकारी समिति के सदस्य भी वही होते हैं जो अपने उत्पाद की उचित मार्केटिंग करके उचित मूल्य प्राप्त करना चाहते हैं। इस तरह की यह Cooperative Society अपने सदस्यों के लिए अनुकूल बाजार तैयार करने के लिए बिचौलियों को खत्म करने का काम करती है और सदस्यों की प्रतिस्पर्धी स्थिति में भी सुधार करने की कोशिश करती है। इस समिति द्वारा अलग अलग सदस्यों का आउटपुट एकत्रित किया जाता है और उत्पाद को सर्वोत्तम संभव कीमत पर बेचने के लिए परिवहन, पैकेजिंग, वेयरहाउसिंग इत्यादि जैसे मार्केटिंग कार्य सहकारी समिति द्वारा किये जाते हैं।

5. हाउसिंग सहकारी समिति (Housing Cooperative)

इस प्रकार की समिति का गठन सिमित आय वाले लोगों द्वारा अपने घर बनाने के उद्देश्य से किया जाता है। इस समिति का उद्देश्य सदस्यों की आवास सम्बन्धी समस्याओं को हल करना होता है। इसलिए इस प्रकार की Cooperative Society से जुड़े हर एक सदस्य का लक्ष्य कम लागत पर आवासीय घर की खरीदारी करना होता है। ये समितियाँ घरों का निर्माण करती हैं और सदस्यों को घर खरीदने के लिए किश्तों में भुगतान करने का विकल्प भी प्रदान करती हैं। ये फ्लेटों का निर्माण भी करती हैं और सदस्यों को प्लाट इत्यादि भी बेचती हैं जिन पर सदस्य अपनी पसंद के अनुसार घरों का निर्माण कर सकें।

सहकारी समिति का पंजीकरण कैसे कराएँ (How to Register Cooperative Society in India)

भारत में सहकारी समिति की पंजीकरण की प्रक्रिया निम्नलिखित है।

  • कानून के मुताबिक एक सहकारी समिति का गठन तभी किया जा सकता है जब उस समिति में कम से कम दस सदस्य अपने पारस्परिक लाभ एवं प्राप्त किये जाने वाले उद्देश्यों के लिए जुड़ना चाहते हों। कहने का आशय यह है की यदि आप सहकारी समिति का गठन करना चाहते हैं तो आपको कम से कम ऐसे दस व्यक्ति ढूँढने होंगे जो समिति का सदस्य बनने के इच्छुक हों।
  • अब जब एक बार कम से कम दस व्यक्ति Cooperative Society का गठन करने के लिए तैयार हो गए हों तो अब अगला कदम उनके द्वारा चीफ प्रमोटर का चुना जाना होना चाहिए। चीफ प्रमोटर सदस्यों द्वारा सदस्यों में से ही चुना जाता है।
  • जब सदस्यों द्वारा समिति का चीफ प्रमोटर चुन लिया जाता है तो अब आगे उन्हें समिति का नाम का भी चयन करना होगा जिस नाम से उनकी समिति जानी जायेगी।
  • उसके बाद अगला कदम Cooperative Society Registration के लिए आवेदन फॉर्म भरने का होता है आवेदन फॉर्म में सोसाइटी का नाम एवं अन्य मांगी गई डिटेल्स सभी कुछ भरकर सम्बंधित  सोसाइटी रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी के कार्यालय में भेजना होता है। नाम इत्यादि की उपलब्धता होने पर रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी द्वारा समिति के नाम पर स्वीकृति प्रदान की जाती है जो तीन महीनों के लिए वैध होता है।
  • सम्बंधित अथॉरिटी से समिति के नाम पर अनुमोदन प्राप्त होने के बाद वैधानिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सम्बंधित संभावित सदस्यों से प्रवेश शुल्क एवं शेयर पूँजी एकत्रित की जाती है। और इसकी मात्रा क्या होगी यह स्वयं सदस्यों द्वारा भी निर्धारित किया जा सकता है। हालांकि कुछ शुल्क पहले से निर्धारित हो सकते हैं जिनमें फेरबदल की कोई संभावना नहीं होती है।
  • Cooperative Society Registration के लिए निर्धारित शुल्क एवं शेयर पूँजी जमा कर देने के बाद रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी के दिशानिर्देशों के अनुसार समिति के प्रमोटर को सोसाइटी के नाम से एक बैंक खाता खोलना होता है। और अथॉरिटी के पास जमा की गई फीस एवं शेयर पूँजी को उस बैंक अकाउंट में जमा कर बैंक से सर्टिफिकेट प्राप्त करना होता है।
  • उसके बाद जब बैंक सम्बन्धी औपचारिकतायें पूर्ण हो जाती हैं तो समिति के प्रमोटर द्वारा रजिस्ट्रेशन का आवेदन रजिस्ट्रार ऑफ़ सोसाइटीज के कार्यालय में जाकर करना होता है। इसके लिए अनेकों प्रकार के दस्तावेज जैसे प्रमोटर सदस्यों की लिस्ट, बैंक सर्टिफिकेट , समिति के कार्य का विवरण, समिति के प्रस्तावित उपनियमों की चार प्रतियाँ, पंजीकरण शुल्क जमा करने का प्रमाण, अन्य दस्तावेज जैसे शपथ पत्र, क्षतिपूर्ति बांड इत्यादि की आवश्यकता होती है।
  • रजिस्ट्रेशन आवेदन के साथ सभी जरुरी दस्तावेज जमा करने के बाद उस नगरपालिका वार्ड का रजिस्ट्रार रजिस्ट्रार ऑफ़ एप्लीकेशन में विवरण दर्ज करता है। इसे आम तौर पर फॉर्म बी में निर्दिष्ट किया जाता है और Cooperative Society Registration के आवेदन फॉर्म को एक सीरियल नंबर दिया जाता है। उसके बाद रजिस्ट्रार द्वारा उसकी एक रसीद जारी की जाती है जिसके माध्यम से प्रमोटर एवं सदस्य सहकारी समिति के रजिस्ट्रेशन का स्टेटस जान सकते हैं।
  • जब रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी द्वारा सभी दस्तावेजों की जाँच कर ली जाती है और वे उनसे संतुष्ट हो जाते हैं तो सोसाइटी के रजिस्ट्रेशन के बारे में उनके ऑफिसियल गजट में सूचित किया जाता है। जिसके बाद सहकारी समिति को रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट जारी कर दिया जाता है।

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मित्रवर, मेरा नाम महेंद्र रावत है | मेरा मानना है की ग्रामीण क्षेत्रो में निवासित जनता में अभी भी जानकारी का अभाव है | इसलिए मेरे इस ब्लॉग का उद्देश्य बिज़नेस, लघु उद्योग, छोटे मोटे कांम धंधे, सरकारी योजनाओं, बैंकिंग, कैरियर और अन्य कमाई के स्रोतों के बारे में, लोगो को अवगत कराने से है | ताकि कोई भी युवा अपने घर से रोजगार के लिए बाहर कदम रखने से पहले, एक बार अपने गृह क्षेत्र में संभावनाए अवश्य तलाशे |

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