आपने बहुत बार म्यूचुअल फण्ड का नाम किसी न किसी के मुहं से अवश्य सुना होगा या फिर बहुत बार टेलीविज़न देखते वक्त विज्ञापन में इसका नाम सुना होगा, तो आपके मष्तिष्क में यही प्रश्न कौंधता होगा की यह म्यूच्यूअल फण्ड है क्या? और कैसे कोई इसमें निवेश करके पैसे कमा सकता है? इन्हीं सब बातों के मद्देनज़र आज हम हमारी कमाई टिप्स नामक इस श्रेणी में म्यूचुअल फण्ड इसकी योजनाओं एवं लाभों अर्थात फायदों के बारे में जानने की कोशिश करेंगे |

यद्यपि म्यूच्यूअल फण्ड में निवेशित पैसा भी बाज़ार में अन्य सम्पतियों को खरीदने पर लगाया जाता है, इसलिए आम लोगों की नज़र में यह क्रिया शेयर बाज़ार में पैसे लगाने जैसी है | लेकिन सच तो यह है की म्यूचुअल फण्ड बाज़ार में उपलब्ध बेस्ट इन्वेस्टमेंट विकल्पों में से एक विकल्प है इसलिए कहा जा सकता है की इसमें शेयर मार्किट में पैसा तो लगाया जाता है लेकिन यह पैसा मार्किट के जानकारों अर्थात विशेषज्ञों द्वारा लगाया जाता है, जिन्हें बाज़ार की अच्छी समझ होती है और यही कारण है की इसमें जोखिम कम हो जाता हैं |

म्यूचुअल फण्ड क्या है

म्यूचुअल फण्ड क्या है (What is Mutual fund in Hindi):

म्यूचुअल फण्ड को Money Market Mutual fund भी कहते हैं, लेकिन इसका सुप्रसिद्ध एवं लोकप्रिय नाम म्यूच्यूअल फण्ड ही है | इसे भारत सरकार द्वारा साल 1992 में व्यक्तिगत लघु अवधि निवेश के उद्देश्य हेतु प्रचलित किया गया था |  कहने का आशय यह है की इसकी शुरुआत इसलिए की गई थी ताकि शेयर एवं प्रतिभूति बाज़ार का अधिक ज्ञान न रखने वाले आम जन भी इस क्षेत्र में निवेश करके उचित लाभ कमाकर अपनी कमाई कर सकें |

शुरूआती दौर में सिर्फ कुछ पब्लिक सेक्टर के बैंकों एवं यूनिट ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (UTI) को ही म्यूचुअल फण्ड में प्रवेश करने की अनुमति दी गई थी, लेकिन वर्तमान में निजी क्षेत्र के बैंकों, वित्तीय संस्थानों एवं अन्य कम्पनियों को भी इसमें प्रवेश की अनुमति दे दी गई है | वर्ष 2000 के बाद इसका नियमन RBI एवं SEBI द्वारा किया जा रहा है, वर्ष 2016 के एक आंकड़े के मुताबिक देश में 45 म्यूच्यूअल फंड कंपनिया कार्यरत थी जिनके द्वारा लगभग 4 लाख करोड़ से ऊपर के वित्त का प्रबंधन किया जा रहा था |

ये कई प्रकार के होते हैं, और जिस तरह की संपत्ति श्रेणियों में इस तरह के फंडों को निवेश किया जाता है, उसी के अनुरूप जोखिम भी अलग-अलग  हो सकते हैं | जैसा कि नाम से ही विदित होता है की एक म्यूचुअल फण्ड एक ऐसा फण्ड है, जिसका निर्माण तब होता है जब बड़ी संख्या में निवेशक इसमें अपना धन लगाते हैं और इसका प्रबंधन विभिन्न संपत्ति श्रेणियों जैसे शेयर, बॉन्डस, मुद्रा बाजार साधनों, कॉल मनी, और अन्य संपत्तियों जैसे स्वर्ण और प्रॉपर्टी में निवेश करने का अनुभव रखने वाले योग्य व्यक्तियों द्वारा किया जाता है ।

आमतौर पर फंडों के नाम से पता चलता है कि कोई फण्ड किस प्रकार की संपत्ति, में निवेश करेगा । उदाहरणार्थ:  एक ‘’diversified equity fund’’ अधिकतर तौर पर शेयरों में निवेश किया जायेगा ठीक उसी प्रकार Gilt Fund के नाम से जाना जा सकता है की यह मुख्य रूप से फॉर्मास्यूटिकल एवं इससे संबंधित उद्योगों की कपनियों के शेयर में निवेश करेगा ।

सामान्य भाषा में यदि हम म्यूचुअल फण्ड को समझने की कोशिश करेंगे तो हम पाएंगे की जब किसी फण्ड में बड़ी संख्या में निवेशक अपना धन लगाते हैं तो उस फण्ड को बराबर भागों में बाँट लिया जाता है जिसे Unit अर्थात इकाई कहा जाता है | उदाहरण के तौर पर शहर में किसी प्रसिद्ध जगह पर एक बिल्डिंग है, जिसकी कीमत पचास लाख है और इसे कोई पांच लोग मिलकर खरीदना चाहते हैं, लेकिन उनके पास इतना फण्ड उपलब्ध नहीं है इसलिए वे इस फण्ड को 100 रूपये की यूनिट में बांटते हैं तो कुल मिलाकर 50000 (पचास हज़ार यूनिट) बनेंगी |

अब यदि किसी के पास 50000 रूपये हैं तो वह इसकी 500 यूनिट खरीद सकता है जिसके पास एक लाख हैं वह 1000  यूनिट कहने का आशय यह है की जिसके पास जितनी अधिक यूनिट होंगी उसका उस बिल्डिंग पर मालिकाना हक़ उतना अधिक होगा | अब मान लीजिये एक साल बाद उसी बिल्डिंग की कीमत एक करोड़ रूपये हो गई तो उसकी एक यूनिट 200 रूपये के बराबर और जिसने पचास हज़ार रूपये में 500 यूनिट खरीदी थी अब उनकी कीमत एक लाख हो गई और जिसने एक लाख में 1000 यूनिट खरीदी थी अब उनकी कीमत दो लाख हो गई |

म्यूचुअल फण्ड आरबीआई और सेबी दोनों द्वारा क्यों विनियमित किया जाता है?

यद्यपि शुरूआती दौर में म्यूचुअल फण्ड सबसे पहले मुद्रा बाजार अर्थात रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया द्वारा विनियमित किये गए |  लेकिन म्यूच्यूअल फण्ड को पूंजी बाजार जैसे शेयर बाज़ार में भी व्यापार करने की छूट है, इसलिए इनको विनियमित करने के लिए दोनों आर. बी. आई और सेबी को जिम्मेदारी सौंपी गई है | चूँकि सेबी प्रतिरक्षा की पहली पंक्ति के रूप में भी काम करता है इसलिए म्यूचुअल फण्ड को भारतीय प्रतिभूति और विनियम बोर्ड (SEBI) के पास पंजीकृत कराना अनिवार्य होता है |

म्यूचुअल फण्ड कैसे काम करते हैं?

प्रत्येक म्यूचुअल फण्ड को योग्य व्यक्तियों के एक समूह द्वारा चलाया जाता है, जिनके द्वारा सम्पति प्रबंधन कंपनी(Asset Management Company ) का गठन किया जाता है | इसके अलावा AMC अर्थात Asset Management Company का संचालन लोगों के एक दूसरे समूह के निर्देशन के अंतर्गत होता है, जिन्हें ट्रस्टी कहा जाता है ।

सम्पति प्रबंधन कंपनी का गठन करने वाले एवं ट्रस्टी लोग ही इन सभी क्रियाकलापों के लिए जिम्मेदार होते हैं, क्योंकि जिन्हें पैसे के प्रबंधन की अधिक जानकारी एवं ज्ञान नहीं होता है, ऐसे लोगों के मेहनत से कमाए हुए पैसे के प्रबंधन का काम इन्हें सौंपा जाता है | कोई Fund House या फण्ड हाऊस के लिए कार्यरत कोई वितरक चाहे वह कोई व्यक्तिगत व्यक्ति हो, बैंक हो, या फिर कोई अन्य कंपनी या वित्तीय संस्थान सभी म्यूचुअल फण्ड बेचने के लिए प्रशिक्षित होते हैं ।

कोई भी फण्ड हाउस सेबी द्वारा अनुमोदित प्रक्रिया द्वारा निर्धारित की गई कीमत पर ही Mutual Fund की ‘यूनिट” निदेशक को आवंटित करता है, जो नेट एसेट वैल्यू (NAV)पर आधारित होती है । सामान्य शब्दों में NAV निकालने के लिए किसी स्कीम में किये गए निवेश की कुल कीमत को, उसी स्कीम में निवेशकों को जारी की गई कुल इकाइयों अर्थात यूनिटो से विभाजित किया जाता है |

म्यूचुअल फण्ड फण्ड की योजनाएँ ( Mutual Fund Schemes in Hindi):

म्यूचुअल फण्डयोजनाओं की यदि हम बात करेंगे तो हम पाएंगे की सामान्य तौर पर म्यूच्यूअल फण्ड द्वारा तीन प्रकार की योजनायें चलाई जाती हैं जिनका संक्षिप्त वर्णन कुछ इस प्रकार से है |

1. खुली योजनाएं (Open Ended Scheme)

 खुली योजना अर्थात Open Ended Scheme से आशय एक ऐसी योजना से है, जो किसी म्यूचुअल फण्ड से जारी रहने के आधार पर उपलब्ध रहती है | कहने का आशय यह है की इन खुली योजनाओं के अंतर्गत कोई भी निवेशक अपनी इच्छा से NAV आधारित मूल्य पर फण्ड को जब चाहे खरीद अथवा बेच सकता है |

जब निवेशक किसी विशेष खुली योजना में यूनिटों की खरीद-फरोख्त करते हैं तो जारी की गई यूनिटों की संख्या भी प्रतिदिन बदलती है और इसी तरह योजना के पोर्टफोलियों की कीमत भी बदलती है इस तरह, एन.ए.वी. भी दैनिक आधार पर बदलते रहते है । भारत में, फण्ड हाउस किसी विशेष योजना की कितनी भी यूनिट बेच सकते है, परंतु कभी-कभी फण्ड हाउस  कुछ समय के लिए किसी योजना की अतिरिक्त यूनिटों की बिक्री को पर रोक लगा देते हैं ।

2. बंद योजनाएं (Close Ended Scheme):

जब निवेशकों द्वारा किसी पेशकश की घोषणा की जाती है तो आमतौर पर बंद योजनाओं अर्थात Close Ended Scheme के अंतर्गत निवेशकों को एक बार यूनिट जारी की जाती है | इस प्रक्रिया को भारतवर्ष में New Fund Offer (NFO) कहा जाता है | उसके बाद इनका दैनिक आधार पर व्यापार करने के लिए  इन यूनिटों को स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध किया जाता है | चूँकि ये यूनिट सूचीबद्ध होती हैं इसलिए कोई भी निवेशक स्टॉक एक्सचेंज के माध्यम से इन यूनिटो को खरीद एवं बेच सकता है |

जैसा की नाम से ही विदित है फण्ड हाउसों द्वारा बंद योजनाओं का प्रबंधन कुछ सिमित वर्षों के लिए ही किया जाता है इसलिए सिमित अवधि की समाप्ति के बाद या तो निवेशकों को पैसे लौटा दिए जाते हैं, या फिर इन्हें खुली योजनाओं में तब्दील कर दिया जाता है | तथापि, सावधानी के लिए आमतौर पर बंद योजनाओं की यूनिट, जो स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होती हैं, उनकी NAV पर छूट एवं ट्रेडिंग मूल्य का अंतर कम हो जाता है, और योजना के बंद होने के समय यह अंतर समाप्त हो जाता है |

3. Exchange Traded Funds (ETF):

Exchange Traded Fund (ETF) को खुली एवं बंद योजनाओं का एक मिश्रण कह सकते हैं, बंद योजनाओं की तरह ETF भी स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होते हैं और इनमे भी दैनिक आधार पर व्यापार होता है | लेकिन इनका मूल्य इनके NAV या स्वर्ण ETF जैसी अंतर्निहित सम्पतियों के बहुत पास होता है ।

यदि किसी अच्छे से मैनेज किये हुए म्यूचुअल फण्ड में निवेश किया गया है, तो दीर्घावधि में, जोकि दस वर्ष अथवा इससे अधिक हो सकता है, तो लाभ होने के अधिक आसार होते हैं । इसलिए निवेशकों के लिए अन्य जोखिम मुक्त निवेशों, जैसे फिक्स डिपाजिट, पब्लिक प्रोविडेंट फण्ड इत्यादि में निवेश करने की अपेक्षा Mutual Fund से पैसा कमाने की संभावना बहुत अधिक होती है ।

म्यूचुअल फण्ड में निवेश करने के लाभ:

म्यूचुअल फण्ड में निवेश करने के कुछ मुख्य फायदे निम्नलिखित हैं |

  • म्यूचुअल फण्ड में कोई भी निवेश कर सकता है अर्थात जिसे शेयर बाज़ार या कम्पनियों का कोई विशेष ज्ञान न हो वह भी Mutual Fund में पैसे लगा सकता है, क्योंकि इसमें निवेशकों का पैसा किस कंपनी में निवेश करना है का निर्णय बाज़ार के विशेषज्ञों द्वारा लिया जाता है | इसलिए निवेशकों की पूंजी एक्सपर्ट के माध्यम से ऐसी कंपनियों में लगा दी जाती है जहाँ से रिटर्न अधिक मिलने की संभावना होती है|
  • म्यूचुअल फण्ड निवेश करने का एक ऐसा जरिया है जिसमे निवेशक अपनी आवश्यकता या जरुरत के मुताबिक निवेश कर सकता है |
  • इसमें 500 रूपये भी इन्वेस्ट किया जा सकते हैं इसलिए कोई भी व्यक्ति अपनी कमाई के अनुरूप इसमें इन्वेस्ट कर सकता है |
  • कुछ म्यूचुअल फण्ड को छोड़कर (जिनमे लॉक इन पीरियड होता है) बाकी में से निवेश की गई राशि को निवेशक जब चाहे निकाल सकता है |
  • कुछ Mutual Fund जिनमे तीन साल या उससे अधिक अवधि के लिए निवेश किया जाता है में आयकर की धारा 80C के अंतर्गत आयकर में छूट का भी प्रावधान होता है | हालांकि इसमें अधिकतम राशि जिस पर छूट लागू होती है 5 लाख निर्धारित की गई है |
  • म्यूचुअल फण्ड निवेशकों के पैसे को ऋण एवं शेयर बाज़ार दोनों में ही निवेश करते हैं |
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