Dal Mill Business Information । दाल मिल बिज़नेस की जानकारी.

Dal Mill Business से आशय दाल का उत्पादन करने वाली इकाई से नहीं है बल्कि दाल को प्रसंस्कृत करने वाली इकाई से है जैसा की हम सबको विदित है की दाल को किसी फैक्ट्री में नहीं बल्कि खेतों में उगाया जाता है । लेकिन प्रत्येक दाल को बाजार में बेचने के लिए उतारने से पहले उसमे उपलब्ध अशुद्धियों एवं बहुत सारे दालों के छिलकों को उतारा जाता है और बहुत सारी दालें ऐसी भी होती हैं जिनमे हलके तेल की पॉलिश भी की जाती है । जिस भी उद्यमी द्वारा यह सब उपर्युक्त कार्य किए जाते हैं उसके लिए हम कह सकते हैं की उसकी खुद की Dal Mill Unit है । कहने का आशय यह है की दाल कोई भी हो उसे ग्राहकों के लिए बाजार में उपलब्ध कराने से पहले संसाधित करने की आवश्यकता होती है । जिन्हें बेहतर ढंग से संरक्षित एवं पकाने के लिए छिलका उतारने एवं तेल लगाने की आवश्यकता हो सकती है । आम तौर पर प्रसंस्कृत की जाने वाली दालों में चना, मूंग, मसूर, उड़द एवं अरहर हैं जिनका उपभोग भारत के सभी राज्यों में मुख्य तौर पर किया जाता है ।

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उत्पाद एवं इसके उपयोग:

आम तौर पर संसाधित किये हुए किसी भी दाल को दाल ही कहा जाता है । दालें नामक यह खाद्य पदार्थ चाहे व्यक्ति शाकाहारी हो या मांसाहारी दोनों के लिए प्रमुख खाद्य हैं। विभाजित दालें या प्रसंस्कृत दालें प्रोटीन की बेहद अहम, प्रमुख एवं सस्ती स्रोत हैं । इनमे दालों की सामान्य किस्में चना, मूंग, मसूर, उड़द एवं अरहर (तूर) दालें हैं । इन दालों में से चना, मसूर एवं मूंग दाल का अधिकाधिक उपभोग उत्तर, मध्य एवं पूर्वी भारत में किया जाता है । इसके अलावा चना, मूंग एवं अरहर दाल का उपयोग पश्चिमी एवं मध्य भारत में भी किया जाता है । उड़द, अरहर एवं मूंग दाल का उपभोग दक्षिणी भारत में अधिक होता है ।

Dal Mill के लिए औद्योगिक परिदृश्य:

जैसा की हम सबको विदित है की दालों का उपयोग लगभग सभी लोगों द्वारा ज्यादा या कम मात्रा में अवश्य किया जाता है चाहे मनुष्य शाकाहारी हो या मांसाहारी इस बात का दालों के उपभोग में कोई फर्क नहीं पड़ता है । कहने का अभिप्राय यह है की दालों का उपयोग शाकाहारी एवं मांसाहारी दोनों प्रकार के मनुष्यों द्वारा किया जाता है | दालें प्रोटीन की मुख्य एवं सस्ती स्रोत होती हैं दालों का उपयोग हर प्रकार के व्यंजन जैसे गर्म व्यंजन, मीठे व्यंजन इत्यादि बनाने में किया जाता है । दालों को भारतीय परिवारों के आम आहार के रूप में जाना जाता है दालों को पकाने के लिए सबसे पहले उन्हें साफ़ किया जाता है उसके बाद उनके छिलके को हटा दिया जाता है और उसके बाद दाल को दो हिस्सों में विभाजित किया जाता है । दाल एक शुष्क अनाज के रूप में जाना जाता है जिसका उपयोग लोग प्रोटीन समबन्धी आवश्यकता की पूर्ति के लिए करते हैं । दालों का भीतरी हिस्सा प्रोटीन एवं विटामिन से समृद्ध होता है इसलिए इसे पकाने के बाद यह आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है । दालों में उचित मात्रा में प्रोटीन होने के कारण प्रोटीन की गुणवत्ता बढाने के लिए इन्हें अन्य अनाज के साथ मिश्रित किया जाता है। दालों को पौष्टिक पौधों के सूखे खाद्य बीज भी कह सकते हैं । दालों का खाद्य पदार्थों के रूप में अधिकांश उपयोग विकासशील देशों में किया जाता है जो वैश्विक खाद्य खपत का लगभग 90% है। कम आय वाले देशों में नियमित तौर पर दालें प्रोटीन के लिए 10% की हिस्सेदारी देती हैं जबकि मानव आहार में लगभग 5 प्रतिशत उर्जा आवश्यकताओं में योगदान देती हैं। दालों की प्रति व्यक्ति खपत शाकाहारियों में अधिक है और एक आकंडे के मुताबिक इंडिया में शाकाहारी लोगों की भरमार है । वर्तमान में दालें भारत की एक बड़ी आबादी में प्रोटीन, उर्जा, खनिज एवं विटामिन के मुख्य स्रोत हैं । कुपोषण को दूर करने में दालों का अहम योगदान है भारत को दालों का सबसे बड़ा उत्पादक देश होने का गौरव प्राप्त है । वर्तमान में देश में विभिन्न कोनों में लगभग 1000 इकाइयाँ हैं जो Dal Making या Dal Mill के कार्य में जुटी हुई हैं।

दाल मिलिंग उद्योग मुख्य रूप से लघु उद्योग के अंतर्गत आते हैं और छोटे पैमाने पर इस तरह के व्यापारों में विशेष विकास हो इसके लिए यह आरक्षित भी है । दाल की घरेलू तौर पर और बाहरी देशों में भी अच्छी मांग है इसलिए इस क्षेत्र में अर्थात Dal Mill Business में नई इकाइयाँ स्थापित करने के लिए नए उद्यमियों के पास अवसर विद्यमान हैं।

दाल के लिए संभावित बाजार:

भारत में दालों की एक वर्ष में प्रति व्यक्ति खपत लगभग 2.8 किलोग्राम है उत्तर, पूर्व एवं मध्य भारत में आम तौर पर दालों की खपत अधिक होती है । पश्चिमी और दक्षिणी भारत में संसाधित दालों की खपत कम है क्योंकि इन क्षेत्रों में गेहूं, चावल एवं हरी सब्जियों को मुख्य आहार के तौर पर उपयोग में लाया जाता है । दालों की खपत भी उनकी अनियमित आपूर्ति उच्च आयात, उच्च प्रसंस्करण लागत एवं अन्य वैकल्पिक उत्पादों के इस्तेमाल के कारण प्रभावित हुई है । भारत की कुल दाल आपूर्ति का 60% दाल का उत्पादन भारत में ही किया जाता है जबकि लगभग 40% दाल विभिन्न देशों से आयात की जाती है।

Dal Mill हेतु आवश्यक लाइसेंस एवं रजिस्ट्रेशन:

Dal Mill Business शुरू करने के लिए उद्यमी को निम्नलिखित लाइसेंस एवं पंजीकरण की आवश्यकता हो सकती है।

  • उद्यमी को स्थानीय प्राधिकरण से लाइसेंस लेने की आवश्यकता हो सकती है ।
  • उद्यमी को उद्योग आधार के अंतर्गत रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता हो सकती है ।
  • उद्यमी को एफएसएसआई रजिस्ट्रेशन की अनिवार्य रूप से आवश्यकता होती है ।
  • उद्यमी को जीएसटी रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता हो सकती है ।
  • इसके अलावा यदि लागू हो तो उद्यमी को ईएसआई एवं ईपीएफ रजिस्ट्रेशन की भी आवश्यकता हो सकती है ।

आवश्यक मशीनरी, उपकरण एवं कच्चा माल :

Dal Mill Unit के लिए मुख्य तौर पर उपयोग में लाया जाने वाला कच्चा माल विभिन्न प्रकार की साबुत दाल है । एक आंकड़े के मुताबिक 1.2 किलो साबुत दाल से 1 किलो संसाधित दाल तैयार की जाती है । साबुत दाल के अलावा कच्चे माल के तौर पर फूड ग्रैड पैकेजिंग मटेरियल की भी आवश्यकता होती है । इसके अलावा Dal Mill Unit के लिए मशीनरी एवं उपकरणों की लिस्ट इस प्रकार से है।

  • आटोमेटिक दाल मिल
  • छिलका उतारने वाली मशीन
  • दाल पोलिश करने की मशीन
  • स्टोरेज टैंक
  • तेल अप्लाई करने के बर्तन
  • आटोमेटिक पैकिंग, फिलिंग और सीलिंग मशीन
  • भार मापने की मशीन
  • अन्य उपकरण

निर्माण प्रक्रिया (Dal making Process):

Dal Mill Business में दाल को प्रसंस्कृत करने के लिए सर्वप्रथम दाल से कंकड़, पत्थर एवं अन्य अवांछित पदार्थ हटा दिए जाते हैं उसके बाद दाल को 2-3 ग्रैड में चलनी की मदद से विभाजित किया जाता है। उसके बाद इस दाल को एक से डेढ़ घंटे के लिए पानी में भिगो दिया जाता है। उसके बाद बराबर नमी अवशोषण के लिए इसे संचित किया जाता है और उसके बाद इन दालों को दो तीन दिनों के लिए धूप में अच्छी तरह सुखाया जाता है । उसके बाद इस दाल को दाल मिल में डाल दिया जाता है जिसमे से संसाधित दाल या विभाजित दाल कण्ट्रोल प्लेट से कोन चैम्बर में गिरती है । जो एक अस्पाईरेटर की मदद से बची हुई साबुत दाल, विभाजित दाल एवं छिलकों को अलग अलग करता है । जिन्हें अलग अलग पैक भी किया जाता है एक मिनी Dal Mill अनेकों दालों जैसे बंगाली चना, बोकला, केसरी, मटर, सोयाबीन इत्यादि को एक ही बार में प्रति घंटे 25-30 किलोग्राम की रफ़्तार से मिल कर सकती है । मसूर को दो बार में मिल किया जाता है इसके अलावा काला चना, हरा चना इत्यादि को 15-20 किलो प्रति घंटे की रफ़्तार से दो बार में मिल किया जाता है ।

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About Author:

मित्रवर, मेरा नाम महेंद्र रावत है | मेरा मानना है की ग्रामीण क्षेत्रो में निवासित जनता में अभी भी जानकारी का अभाव है | इसलिए मेरे इस ब्लॉग का उद्देश्य बिज़नेस, लघु उद्योग, छोटे मोटे कांम धंधे, सरकारी योजनाओं, बैंकिंग, कैरियर और अन्य कमाई के स्रोतों के बारे में, लोगो को अवगत कराने से है | ताकि कोई भी युवा अपने घर से रोजगार के लिए बाहर कदम रखने से पहले, एक बार अपने गृह क्षेत्र में संभावनाए अवश्य तलाशे |

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