Gig Economy क्या है? और भारत में इसका चलन बढ़ता क्यों जा रहा है?

Gig Economy की बात करें तो यह पूरी तरह Gig Worker पर आधारित है जी हाँ भले ही आप गिग वर्कर के बारे में जानते हों या नहीं लेकिन अपने देश भारत में भी इनकी संख्या करोड़ों में है। इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था में इनकी अहम् भूमिका है। कहने का अभिप्राय यह है की भले ही किसी व्यक्ति के लिए गिग इकॉनमी या फिर गिग वर्कर एक नया नाम हो लेकिन सच्चाई यह है की यह कोई नई आर्थिक प्रक्रिया नहीं बल्कि यह दशकों से चली आ रही है। लेकिन चूँकि वर्तमान में भारत में भी इस तरह की यह इकॉनमी जोरों शोरों से अपने पाँव पसार रही है इसलिए इस पर चर्चाएँ तेज होना स्वभाविक है। एक उद्यमी या बिजनेसमैन को अपने व्यापारिक कार्यों को करने के लिए गिग वर्कर की आवश्यकता कभी भी हो सकती है इसलिए बिजनेस एडवाइस की इस श्रेणी में Gig Economy पर जानकारी देना बेहद जरुरी हो जाता है। तो आइये जानते हैं की इस प्रकार की यह अर्थव्यवस्था क्या है और किस पर आधारित है।

Gig Economy ke fayde nuksan

गिग इकॉनमी क्या है (What is Gig Economy in Hindi)

Gig Economy को समझने से पहले गिग वर्कर को समझना होगा जी हाँ जैसा की हम सबको विदित है की लगभग हर कारोबार को कुछ स्थायी तो कुछ अस्थायी कर्मचारियों की आवश्यकता होती है। अर्थात एक कारोबार को चलाने के लिए स्थायी कर्मचारियों को मासिक वेतन दिया जाता है। तो वहीँ अस्थायी कर्मचारियों को किसी विशेष टास्क या प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए नियुक्त किया जाता है और प्रोजेक्ट पूरा होते ही उन्हें काम से छुट्टी दे दी जाती है। साधारण शब्दों में कहें तो ऐसे कर्मचारी जिन्हें किसी प्रोजेक्ट विशेष को पूरा करने के लिए नियुक्त किया जाता है उन्हें Gig Worker कहा जाता है। इसलिए Gig Economy की बात करें तो यह फ्री बाजार प्रणाली है जहाँ अस्थायी पदों पर कर्मचारियों की नियुक्ति होती है और कम्पनियां अपने किसी प्रोजेक्ट विशेष के लिए अल्पकालीन तौर पर कर्मचारियों की नियुक्ति करते हैं। वैसे देखा जाय तो अर्थव्यवस्था में गिग नामक इस टर्म की उत्पति संगीत उद्योग से शुरू हुई है। क्योंकि यहाँ चाहे गायक हो, संगीतकार हो या कोई अन्य इन्हें तभी पारिश्रमिक मिलता है जब इनका कोई गाना इत्यादि लांच होता है। ठीक इसी तरह फिल्म इंडस्ट्री में भी इसी तरह की अर्थव्यवस्था का बोलबाला है क्योंकि अभिनेता, अभिनेत्रियों इत्यादि को प्रत्येक फिल्म के आधार पर भुगतान किया जाता है। और आज जब हम इन्टनेट के माध्यम से अनेकों काम कर पाने में सक्षम हैं तो ऐसे में जब किसी कंपनी/व्यक्ति द्वारा किसी भी पेशेवर व्यक्ति चाहे वह डॉक्टर हो, वकील हो, इंजिनियर हो, प्रोफेसर हो, डॉक्टर हो, फ्रीलांसर हो, या फिर कोई अन्य जिसे टास्क या प्रोजेक्ट पूर्ण करने के लिए अस्थायी तौर पर नियुक्त किया गया हो । इस स्थिति में ये सभी पेशेवर व्यक्ति भी Gig Economy का ही हिस्सा होते हैं।

गिग इकॉनमी में कौन कौन कर्मचारी शामिल होते हैं

हालांकि हम उपर्युक्त वाक्यों में स्पष्ट कर चुके हैं की ऐसे सभी कर्मचारी जो अस्थायी तौर पर कार्यरत होते हैं। भले ही वे कितनी ही दीर्घ या अल्पकालीन अवधि तक कंपनी या प्रोजेक्ट के साथ जुड़े रहें  Gig Worker  कहलाते हैं। इन कर्मचारियों को निम्न श्रेणियों में विभाजित भी किया जा सकता है।

  • ठेके पर काम करने वाले कर्मचारी जो स्वतंत्र रूप से अस्थायी तौर पर काम करते हैं।
  • ऑनलाइन प्लेटफोर्म जैसे फ्रीलान्सर, ब्लॉगर, एफिलिएट मार्केटिंग इत्यादि गतिविधियाँ करने वाले कर्मचारी।
  • ऐसे लोग जिन्हें काम करने के लिए फ़ोन पर कभी भी बुलाया जा सकता है अर्थात वे अपने ग्राहकों के कॉल आने पर काम करते हैं और अपनी कमाई करते हैं ।
  • सड़कों का निर्माण करने, कंस्ट्रक्शन इत्यादि कामों में लगे ठेका फर्म के कर्मचारी।
  • अन्य क्षेत्रों से जुड़े सभी अस्थायी कर्मचारी।      

कुछ स्थितियों में कर्मचारी एवं कंपनी के बीच एक ऐसा एग्रीमेंट होता है जिसमें काम पड़ने पर कंपनी उस कर्मचारी को फ़ोन कॉल पर कभी भी बुला सकती है और उसे आना होता है। यहाँ तक की काम की कीमतें भी पहले से ही निर्धारित होती हैं और जब कर्मचारी द्वारा काम कर लिया जाता है उसके बाद कंपनी द्वारा उसे एग्रीमेंट के मुताबिक ही भुगतान किया जाता है। लेकिन ध्यान रहे इस स्थिति में काम का समय तय नहीं होता इसलिए कम्पनी द्वारा आवश्यकता पड़ने पर कर्मचारी को कभी भी बुलाया जा सकता है।

भारत में गिग इकॉनमी

हालांकि संगठित क्षेत्र में आज भी स्थायी कर्मचारियों का बोलबाला है क्योंकि संगठित क्षेत्र अपने कार्यों को निष्पादित करने के लिए स्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति बड़े पैमाने पर करते हैं। लेकिन इसके बावजूद भी बहुत सारे काम ऐसे होते हैं जिनके लिए इन्हें अस्थायी कर्मचारियों को भी नियुक्ति करने की आवश्यकता होती ही होती है। आज के समय में कम्पनियां भी यही चाहती हैं की वह सिर्फ उसी काम के लिए भुगतान करें जो काम पूर्ण हो रहा हो इसलिए Gig Worker उनके लिए एक अच्छा माध्यम है। कहने का आशय यह है की चाहे कोई कंपनी हो या बिजनेसमैन हर कोई अपने फायदे के बारे में ही सोचता है इसलिए जब भी इन्हें लगता है की यह काम तो अस्थायी कर्मचारियों से भी हो सकता है तो वे उस काम के लिए परमानेंट कर्मचारी नियुक्त करना पसंद नहीं करते हैं। यही कारण है की Gig Economy भारत में भी बड़ी तीव्र गति से आगे बढ़ रही है। युवाओं को अपनी क्षमता एवं कुशलता के मुताबिक कमाई करना काफी पसंद आ रहा है क्योंकि उन्हें इस तरह का यह काम करके काफी समय अपने व्यक्तिगत जीवन के लिए भी मिल पाता है। स्थायी नौकरी में व्यक्ति को कम से कम आठ घंटे तो ड्यूटी करने की आवश्यकता होती ही है इसलिए आम तौर पर लोगों का 9AM से 5PM तक का समय कार्यालय में ही बीत जाता है। जबकि Gig Economy में कर्मचारियों को कोई एक टास्क या प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए दिया जाता है इसलिए इसमें टाइम की ज्यादा तो नहीं लेकिन थोड़ी बहुत फ्लेक्सिबिलिटी रहती है। इसके अलावा जब से भारत में ऑनलाइन कारोबार में वृद्धि हुई है इसकी वृद्धि के साथ भारत में गिग वर्कर की संख्या में भी इजाफा हुआ है इसलिए Gig Economy को भी यहाँ प्रोत्साहन मिला है। एक आंकड़े के मुताबिक भारत में लगभग 12-13 करोड़ गिग वर्कर उपलब्ध हैं और इनमें लगातार तेजी से वृद्धि होती जा रही है।

गिग इकॉनमी के फायदे (Advantages of Gig Economy):  

Gig Economy के कुछ प्रमुख फायदों की लिस्ट निम्नवत है।

  • चूँकि Gig Economy में कर्मचारियों को कोई टास्क या प्रोजेक्ट पूरा करने की जिम्मेदारी दी जाती है इसलिए ऐसे बहुत सारे फ्रीलांसर हैं जिन्हें लगता है की उन्हें अपने काम करने के समय में काफी फ्लेक्सिबिलिटी प्रदान होती है। फ्रीलांसर तो जहाँ से चाहें काम कर सकते हैं और अपने काम के घंटे भी खुद ही तय कर सकते हैं। इसलिए गिग इकॉनमी का फ्लेक्सिबिलिटी एक सबसे बड़ा फायदा है।
  • गिग इकॉनमी में कर्मचारियों को अधिक स्वतंत्र होकर अपना कार्य करने की आज़ादी प्रदान होती है। गिग वर्कर को आम तौर पर ऐसा एहसास होता रहता है की उन्हें कम्पनी, संगठनों या व्यक्तियों द्वारा काम करने की जिम्मेदारी दी जाती है और उसे पूरा होने तक वे स्वतंत्र तौर पर कार्य करते हैं।
  • चूँकि ये अस्थायी तौर पर कार्यरत होते हैं इसलिए इन्हें अलग अलग कंपनी या क्लाइंट से अलग अलग टास्क पूर्ण करने के लिए मिल सकते हैं। जिससे ये एक जैसे कार्यों को करने से उत्पन्न होने वाली बोरियत या नीरसता से बच जाते हैं।
  • गिग इकॉनमी के तहत कार्यरत कर्मचारियों को भुगतान के लिए महीने तक का इंतजार नहीं करना पड़ता बल्कि प्रोजेक्ट चलने के बीच बीच में या फिर पूर्ण होने के बाद उन्हें तुरंत पैसा मिल जाता है।
  • कर्मचारी अपना कार्यस्थल, कार्य करने का समय इत्यादि अपनी सहूलियत के आधार पर चुनकर इसके साथ कुछ अन्य काम भी कर सकते हैं।

गिग इकॉनमी के नुकसान (Disadvantages of Gig Economy):

Gig Economy के कुछ नुकसान भी हैं जिनकी लिस्ट कुछ इस प्रकार से है।

  • चूँकि इसमें कर्मचारी अस्थायी तौर पर नियुक्त होते हैं इसलिए वे कंपनी द्वारा दिए जाने वाले अनेकों लाभों जैसे हेल्थ इंश्योरेंस, बोनस इत्यादि से वंचित रहते हैं।
  • अस्थायी तौर पर कार्यरत होने के कारण नियमित काम या रोजगार की कोई गारंटी नहीं होती है इसलिए इनके पास नियमित आय का भी साधन नहीं होता है।
  • Gig Economy में गिग वर्कर को हर एक टास्क या प्रोजेक्ट पूर्ण होने के बाद नया प्रोजेक्ट या टास्क ढूँढने की आवश्यकता होती है। जिससे उनमें मानसिक तनाव का स्तर बढ़ जाता है।
  • इस अर्थव्यवस्था के तहत आम तौर पर उन्हीं लोगों को काम मिल पाता है जो अपने क्षेत्र में माहिर हैं। अर्थात कुशल एवं योग्य व्यक्ति के अलावा अपने काम में विशेषज्ञता भी होनी चाहिए।

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मित्रवर, मेरा नाम महेंद्र रावत है | मेरा मानना है की ग्रामीण क्षेत्रो में निवासित जनता में अभी भी जानकारी का अभाव है | इसलिए मेरे इस ब्लॉग का उद्देश्य बिज़नेस, लघु उद्योग, छोटे मोटे कांम धंधे, सरकारी योजनाओं, बैंकिंग, कैरियर और अन्य कमाई के स्रोतों के बारे में, लोगो को अवगत कराने से है | ताकि कोई भी युवा अपने घर से रोजगार के लिए बाहर कदम रखने से पहले, एक बार अपने गृह क्षेत्र में संभावनाए अवश्य तलाशे |

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